Tuesday, 19 February 2013

शिक्षक भर्ती या छलाबा!

शिक्षक भर्ती या छलाबा!
जब मैं छोटा था, तब मेरी मां छलावे के बारे में अकसर चर्चा करती थीं कि छलावा कोइ सा भी रुप धारण कर लेता है। किसी को भी अपने जाल में फंसा लेता है। परिषदीय स्कूलों में 72 हजार शिक्षकों की भर्ती प्रकि्रया को देखकर मेरे बचपन की यादें ताजा हो गइ हैं। क्योंकि शिक्षक भर्ती प्रकिया ने प्रदेश भर के करीब 8 लाख आवेदनकर्ताओं को अपनी जद में ले लिया है। यह भर्ती प्रकि्रया भी छलावे का पूरा-पूरा अहसास करा रही है। वर्ष-2011 से अब तक आवेदनकर्ताओं को छला जा रहा है। फिलहाल, माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद ने भर्ती प्र्रिक्रया पर रोक लगाकर जहां आवेदनकर्ताओं को बड़ा झटका दिया है। वहीं, शिक्षा विभाग में सकि्रय दलालों की मोटी कमार्इ पर भी अड़ंगा लगा दिया है। अभी तक प्रति आवेदनकर्ताओं के करीब 1500 से 5000 हजार रुपये तक बीच भंवर में फंसा चुके हैं, जिससे प्रदेश भर के बेराजगारों के करीब 3 अरब रुपये प्रदेश सरकार की झोली में पहुंच चुके हैं। एक ओर जहां लाखों आवेदनकर्ता नौकरी की बाट जोह रहे हैं। वहीं, प्रदेश भर के लाखों नौनिहालों का भविष्य अधर में लटका हुआ है। आखिर बिना शिक्षकों के नौनिहालों का भविष्य कैसे सुधर सकता है। आज आलम यह है कि संभल, मउ, चंदौली, महाराजगंज, जालौल, फैजाबाद, अमरोहा, औरया, उरर्इ, महौवा जैसे जनपदों में कर्इ हजार विधालय बंद होने की कगार पर हैं या फिर एक शिक्षक के सहारे चल रहे हैं। वहीं, दूसरी ओर लखनउ, आगरा, नोएडा, कानपुर, गाजियाबाद जैसे जनपदों में शिक्षकों की भरमार है। अनगिनत विधालय ऐसे भी हैं जहां बालक-बालिकाओं की संख्या बहुत ही कम है, लेकिन शिक्षकों की संख्या अपेक्षा से ज्यादा है। यह कहना गलत नहीं होगा कि इसके लिए सरकार जिम्मेदार है। सरकार को चाहिए की शिक्षक भर्ती प्रकि्रया को गंभीरता से ले और बेरोजगार प्रशिक्षितों को जल्द से जल्द नौकरी दे, ताकि स्कूलों की दशा को सुधारा जा सके। सरकार स्वयं कोर्ट की शरण ले और लाखों बेरोजगारों व नौनिहालों के भविष्य को ध्यान में रखकर इस प्रंि्रक्रया को आगे बढ़ाने मेें साकारात्मक सोच बनाए। 
                                                                                                             उस्मान सैफी

सच कहूं...

 मैंने इस कहानी का टाइटिल सच कहूं... 

इसलिए दिया है कि क्योंकि सच कहते हुए भी मुझे आज भी उतना ही डर लग रहा है कि जितना इस घटना के घटने में लग रहा था। मेरे एक जान-पहचान के युवक ने अपनी प्रेम कहानी सुनार्इ। मुझे उसे सुनकर जितना अच्छा लगा उससे कहीं ज्यादा दुख भी हुआ। दुख होना लाजमी था। लड़का मुसिलम और लड़की हिन्दु,थी। एक दूसरे से प्यार करना कोर्इ बुरी बात नहीं है, लेकिन बात शादी तक हो तो मध्यमवर्गी परिवार में इस शादी को शादी नहीं मानते। फिर भी लड़की ने अपने माता-पिता को शादी के लिए तैयार कर लिया और एक दिन एनसीआर के कोर्ट में शादी भी हो गर्इ। यहां तक जो हुआ उसके बारे में मुझे जानकारी थी, लेकिन जो आगे होने वाला है। उसके बारे में मुझे कुछ भी मालूम नहीं था। अब लड़की को उसके मायके से दुल्हन के रुप में लाना था, लेकिन शर्त यह थी कि लड़के को दुल्हे के रुप में लड़की के घर पहुंचना है। दुल्हन को लाने का न्यौता मुझे भी दिया गया। साथ ही मेरी महिला मित्र को भी साथ लेकर चलने के लिए कहा गया। दुल्हन को साथ लाने के लिए बढि़या वाली कार भी किराये पर कर ली। पूरी तैयारी के साथ हम दूल्हे के साथ चल दिये। कार मैं, मेरी दोस्त, दूल्हा और चालक थे। गली से बाहर हमारी कार को रोकने के लिए कह दिया गया। काफी देर तक हम लड़की पक्ष के लोगों के आने का इंतजार करते रहे, लेकिन कोर्इ नहीं आया। इससे कार चालक को शक होने लगा। उसे लगा कि यह सब फर्जीवाड़ा हो रहा है। जरुर दाल में कुछ काला है। काफी इंतजार के बाद दुल्हन का भार्इ मौके पर पहुंचा और उसने मुझसे कहा बारात कहां कि भार्इ बारात कहां हैं.. मैने कहा कैसी बारात... बारात कहां से आ रही है। उसने कहा दुल्हा आपकी कार में बैठा है बारात के बारे मेें भी आपको जानकारी होगी। उधर, कार चालक ने अपने साथियों को फोन करके यहां का घटनाक्रम बताना शुरु कर दिया। वहां जो नजारा चल रहा था। उसे देखकर मेरी सांसें फूलनें लगीं। क्योेंकि कार चालक को भी बारात के बारे में कोर्इ जानकारी नहीं दी गर्इ थी। अब बैंड-बाजा भी तैयार था, लेकिन बाराती न होने के कारण लड़की के भार्इ ने बारात चढ़ने से मना कर दिया। यह देखकर मेरी और मेरी महिला मित्र की धड़कनें बढ़ने लगीं। कार चालक के बुलावे पर वहां कर्इ लोग एकत्र हो गए। इससे साफ जाहिर हो गया कि अब हंगामा होने वाला है। लड़की का भार्इ अपनी जिद पर अड़ा था। उसने बिना बारातियों के बारात चढ़ने से साफ इंकार कर दिया। अब मुझे सर्दियों में भी पसीने छूटने रहे थे। अब लग रहा था कहीं हिन्दु संगठन मेरी और दुल्हे की हजामत न बना दें। मुझे बहुत डर सता रहा था कि मेरे साथ-साथ मेरी दोस्त की हालत भी खराब होने वाली है। हम कुछ ही देर में पुलिस की हिरासत में होंगे। अब हमें कोर्इ नहीं बचा सकता है। मुझे यह सब देखकर इतना गुस्सा आ रहा था कि मैं बार-बार दूल्हे को गाली दे रहा था और उस रात को कोस रहा था कि आखिर मैं यहां आया ही क्यों हूं। मेरे मुंह से एक ही बात निकल रही थी कि अल्लाह आज मुझे बचा लो अगली बार ऐसा गलती नहीं करुंगा। करीब 15 मिनट के बाद मेरी उपर वाले ने सुन ली और लड़की की मां दस-बीस महिलाओं व लोगों को मौके पर लेकर पहंुंची। इसके बाद बारात की चढ़त शुरु हो सकी। जिसके लिए हम अपनी जान पर खेल रहे थे। कार चालक द्वारा बुलार्इ गर्इ भीड़ को भी किसी हंगामे का इंतजार था। अब बारात की चढ़त शुरु हो चुकी थी। दूल्हा घोड़ी पर चढ़ गया। हम भी पीछे-पीछे चल दिये। चढ़त के बाद किसी तरह हम तीनों ने खाना खाया और खाना खाते समय मैं दुल्हन को आप बीती बता रहा था। मगर, दुल्हन ने जो कहा उसे सुनकर मुझे बहुत दुख हुआ। दुल्हन ने कहा आपको किसने बुलाया। शादी की सभी रस्में हम खुद भी निभा सकते हैं। 
                                                                                                        उस्मान सैफी

Saturday, 16 February 2013

ये क्या तमाशा है 

भारत में एक समाज ऐसा भी है जो डॉ. भीमराव अंबेडकर  को जरुरत से ज्यादा तरजीह देता हैं. मेरा सवाल उस समाज से और देश की जनता से है. भारतीय सिव्धान  को तेयार करने में  डॉ. भीमराव अंबेडकर के अलावा के. एम. मुंशी, किर्श्नामाचारी, गोपाल स्वामी अय्यर, अल्ला्दी किर्श्ना अय्यर, मोहम्मद सादुल्ला खान, माधवराव और डी. पी. खेतान भी शािमल  थे. मगर, अफ़सोस की बात नही तो और क्या है. सिव्धान  का िनर्माण टीम वर्क था, लेिकन दुिनया को िसर्फ  टीम वर्क के मुिखया के बारे में बताया गया. और किसी का नाम भी नही लिया जाता है. डॉ. भीमराव  अंबेडकर ने सिव्धान का निर्माण करा कर देश पर कोई एहसान नही किया है. इस काम के बदले उनकी टीम ने ६३ लाख ९७ हजार ७२९ रूपये खर्च कर  ि दए हैं. उनकी टीम ने २ साल ११ महीने और १८ ि दन इसी पैसे से िबरटएन, अमेरिका, अयार्लेंड, कनाडा, आसटेरेिलया, दिछन अफ्रीका, जर्मन और रूस की सेर भी की थी. यही नही खाना पीना और भी एशो आराम के िलए थे. िफर क्यों बाबा.........बाबा ...........बाबा का तमाशा बना रखा है 
                                                                                                    उस्मान सैफ़ी 

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